बहुलतावादी भारत में राष्ट्र-निर्माण का पथ : पंथनिरपेक्षता, सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक देशभक्ति किसी भी राष्ट्र की पहचान और उसके अस्तित्व का आधार उसकी एकता के सूत्र होते हैं। आज वैश्विक स्तर पर राष्ट्र-राज्य अपनी मूल पहचान को लेकर एक वैचारिक संक्रमण काल से गुजर रहे हैं। जहाँ एक ओर अमेरिका अपने ईसाई राष्ट्रवाद और कट्टर धर्मनिरपेक्षता के बीच 'नागरिक धर्म' (Civil Religion) के माध्यम से संतुलन की खोज कर रहा है, वहीं पश्चिम एशिया (अरब जगत) के कई देश धर्म-आधारित कट्टरता के ऐतिहासिक दुष्प्रभावों को झेलने के बाद अब धीरे-धीरे सहिष्णुता और आधुनिकीकरण की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। भारत में भी 'हिंदुत्व' (एक साझा सांस्कृतिक-धार्मिक पहचान की मांग) और 'पंथनिरपेक्षता' (संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता) के बीच का द्वंद्व देश की भावी दिशा को आकार दे रहा है। ऐसे में भारत के लिए एक ऐसा मार्ग खोजना अनिवार्य है जो विविधता का सम्मान भी करे और राष्ट्रीय एकता को भी अक्षुण्ण रखे। वैश्विक उदाहरणों से भारत के लिए सीख अमेरिकी अनुभव से सीख : केवल धार्मिक पहचान या केवल भौतिक धर्मनिरपेक्षता ...
कृत्रिम मेधा : तकनीकी प्रगति और मानवीय विवेक के मध्य संतुलन 21वीं सदी के वैचारिक और तकनीकी परिदृश्य में कृत्रिम मेधा (Artificial Intelligence - AI) एक ऐसी धुरी बनकर उभरी है, जिसने मानव सभ्यता के समक्ष संभावनाओं और चुनौतियों का एक नया क्षितिज खोल दिया है। ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो भाप के इंजन से लेकर इंटरनेट के उद्भव तक, प्रत्येक औद्योगिक क्रांति ने मानव श्रम और उत्पादकता को पुनर्परिभाषित किया है। परंतु, वर्तमान 'चौथी औद्योगिक क्रांति' का मुख्य आधार यानी AI, केवल शारीरिक श्रम का विकल्प नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर मनुष्य की सबसे अनूठी विशेषता - 'सोचने और निर्णय लेने की क्षमता' - को प्रभावित और प्रतिस्थापित करने का प्रयास कर रही है। औद्योगिक क्रांति के प्रथम चरण में भाप और पानी की शक्ति के माध्यम से उत्पादन का मशीनीकरण हुआ। इसके द्वितीय चरण में बिजली के आविष्कार और असेंबली लाइन के जरिए बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव हुआ। इसके तृतीय चरण को 'डिजिटल क्रांति' भी कहा जाता है, जिसमें कंप्यूटर, इंटरनेट और इलेक्ट्रॉनिक्स का उदय हुआ। इसका चौथा चरण 'इंटेलिजें...