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Digital Dilemma : The Illusion of Stress Relief डिजिटल दुविधा : तनावमुक्ति का छलावा

  डिजिटल दुविधा : तनावमुक्ति का छलावा ​ ​"हम तकनीक का उपयोग कर रहे हैं या तकनीक हमारा?" - यह प्रश्न आज के डिजिटल युग का सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न बन चुका है। आधुनिक भागदौड़ भरी जिंदगी में दिनभर की थकान, काम के दबाव और मानसिक तनाव से राहत पाने के लिए जब एक आम इंसान अपने स्मार्टफोन की स्क्रीन रोशन करता है, तो उसे लगता है कि वह विश्राम के कुछ क्षण चुरा रहा है। परंतु, पर्दे के पीछे 'असीम स्क्रॉलिंग' (Endless Scrolling) और 'डूमस्क्रॉलिंग' (Doomscrolling) का एक ऐसा चक्रव्यूह रचा जा चुका है, जो तनाव मिटाने के बजाय मानसिक स्वास्थ्य को एक गहरे दलदल में धकेल देता है। हालिया वैश्विक अध्ययनों और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, तनावमुक्ति के लिए अनियंत्रित सोशल मीडिया और इंटरनेट का सहारा लेना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि खुद एक नई समस्या का जन्म है। ​ डिजिटल क्षितिज के दो पहलू : सकारात्मकता बनाम नकारात्मकता ​इंटरनेट और सोशल मीडिया मानव सभ्यता के इतिहास में संचार के सबसे शक्तिशाली माध्यम बनकर उभरे हैं। जहाँ इन्होंने पूरी दुनिया को एक 'वैश्विक गाँव' (Global Villag...
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भारत में जनांदोलन : जेपी से सीजेपी तक : एक आलोचनात्मक विमर्श Mass Movements in India : From JP to CJP : A Critical Discourse

  ​ भारत में जनांदोलन : जेपी से सीजेपी तक : एक आलोचनात्मक विमर्श  ​ लोकतंत्र की धड़कन और जनांदोलनों का बदलता स्वरूप ​लोकतंत्र केवल पांच वर्षों में एक बार मतदान करने की यांत्रिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह नागरिकों की सतत, सचेत और सक्रिय भागीदारी पर आधारित एक जीवंत व्यवस्था है। प्रसिद्ध दार्शनिक ज्यां-ज्याक रूसो ने कभी कहा था कि "ब्रिटेन की जनता केवल चुनाव के समय स्वतंत्र होती है, उसके बाद वह पुनः दास बन जाती है।" भारतीय लोकतंत्र इस दासता को नकारते हुए नागरिकों को 'जनांदोलनों' के रूप में एक ऐसा सशक्त माध्यम प्रदान करता है, जो सरकार को निरंतर जवाबदेह बनाए रखता है। स्वतंत्रता आंदोलन के गौरवशाली इतिहास से लेकर आधुनिक दौर के विभिन्न संघर्षों तक, जन आंदोलनों ने भारत की नीतियों, शासन व्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने को गहराई से प्रभावित किया है। ​परंतु, इक्कीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक में यह यक्ष प्रश्न भारतीय राजनीति के केंद्र में आ गया है कि क्या भारत में जनांदोलन अपनी वास्तविक परिवर्तनकारी क्षमता खो रहे हैं? जहाँ एक ओर हाल के कुछ आंदोलनों ने अभूतपूर्व जन-एकत्रीकरण दिखाया...