बहुलतावादी भारत में राष्ट्र-निर्माण का पथ : पंथनिरपेक्षता, सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक देशभक्ति
किसी भी राष्ट्र की पहचान और उसके अस्तित्व का आधार उसकी एकता के सूत्र होते हैं। आज वैश्विक स्तर पर राष्ट्र-राज्य अपनी मूल पहचान को लेकर एक वैचारिक संक्रमण काल से गुजर रहे हैं। जहाँ एक ओर अमेरिका अपने ईसाई राष्ट्रवाद और कट्टर धर्मनिरपेक्षता के बीच 'नागरिक धर्म' (Civil Religion) के माध्यम से संतुलन की खोज कर रहा है, वहीं पश्चिम एशिया (अरब जगत) के कई देश धर्म-आधारित कट्टरता के ऐतिहासिक दुष्प्रभावों को झेलने के बाद अब धीरे-धीरे सहिष्णुता और आधुनिकीकरण की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। भारत में भी 'हिंदुत्व' (एक साझा सांस्कृतिक-धार्मिक पहचान की मांग) और 'पंथनिरपेक्षता' (संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता) के बीच का द्वंद्व देश की भावी दिशा को आकार दे रहा है। ऐसे में भारत के लिए एक ऐसा मार्ग खोजना अनिवार्य है जो विविधता का सम्मान भी करे और राष्ट्रीय एकता को भी अक्षुण्ण रखे।
वैश्विक उदाहरणों से भारत के लिए सीख
अमेरिकी अनुभव से सीख : केवल धार्मिक पहचान या केवल भौतिक धर्मनिरपेक्षता अपूर्ण
अमेरिका का वर्तमान सामाजिक ध्रुवीकरण यह दर्शाता है कि किसी बहुसांस्कृतिक देश को केवल 'ईसाई जड़ों' की ओर मोड़ना या उसे पूरी तरह से 'भावना-रहित कट्टर धर्मनिरपेक्ष' बना देना—दोनों ही अतिवादी दृष्टिकोण सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करते हैं। सैमुअल गोल्डमैन का 'नागरिक धर्म' यह याद दिलाता है कि राष्ट्र को जोड़ने के लिए कुछ साझा पवित्र मूल्य चाहिए, जो धर्मग्रंथों से नहीं बल्कि संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं, राष्ट्रीय प्रतीकों और साझा राष्ट्रीय नायकों (जैसे महात्मा गांधी, डॉ. बी.आर. अंबेडकर) के प्रति सम्मान से पैदा होते हैं।
पश्चिम एशिया (अरब देशों) के संकट से सीख : धर्म-आधारित शासन की सीमाएं
अरब देशों (जैसे सीरिया, इराक, यमन) का हालिया इतिहास गवाह है कि जब राज्य पूरी तरह से एक संकीर्ण धार्मिक पहचान (Theocratic Model) पर आधारित हो जाता है, तो वह अंततः आंतरिक संघर्ष, संप्रदायवाद (शिया-सुन्नी संघर्ष) और अस्थिरता का शिकार बन जाता है। यहाँ तक कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देश भी अब यह महसूस कर चुके हैं कि आधुनिक विश्व में आर्थिक प्रगति और स्थिरता के लिए धार्मिक कट्टरता को पीछे छोड़कर सहिष्णुता, बहुसांस्कृतिक स्वीकार्यता और सामाजिक सुधारों को अपनाना ही एकमात्र विकल्प है।
भारत का द्वंद्व : पंथनिरपेक्षता बनाम हिंदुत्व
भारत में राष्ट्र की पहचान को लेकर मुख्य रूप से दो वैचारिक धाराएं आमने-सामने दिखाई देती हैं :
• पंथनिरपेक्षता (Secularism) का भारतीय मॉडल : पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता (जहाँ धर्म और राज्य पूरी तरह अलग हैं) के विपरीत, भारतीय पंथनिरपेक्षता 'सर्वधर्म समभाव' और 'समान दूरी' (Principled Distance) के सिद्धांत पर आधारित है। हालांकि, व्यावहारिक राजनीति में इस पर कभी-कभी वोटबैंक की राजनीति और छद्म-धर्मनिरपेक्षता (Pseudo-secularism) के आरोप लगते रहे हैं, जिससे बहुसंख्यक वर्ग में असंतोष उपजा है।
• हिंदुत्व या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद : इसके समर्थकों का तर्क है कि भारत की मूल पहचान उसकी सदियों पुरानी सभ्यतागत और सांस्कृतिक विरासत (सनातन/हिंदू संस्कृति) में निहित है, जिसने ऐतिहासिक रूप से सभी का स्वागत किया। हालांकि, इसका अतिवादी या राजनीतिक रूप गैर-बहुसंख्यक समुदायों (मुस्लिम, ईसाई आदि) में असुरक्षा की भावना पैदा कर सकता है, जिससे विविधता के बिखरने का खतरा रहता है।
भविष्य की सही राह : भारत का 'मध्यम मार्ग'
भारत जैसे उपमहाद्वीप और अत्यंत विविधतापूर्ण समाज के लिए न तो पश्चिमी शैली की भावना-शून्य धर्मनिरपेक्षता पूरी तरह काम कर सकती है और न ही बहुसंख्यकवादी धार्मिक राष्ट्रवाद। भारत के सुरक्षित भविष्य के लिए निम्नलिखित बहुआयामी दृष्टिकोण आवश्यक हैं :
• संवैधानिक देशभक्ति (Constitutional Patriotism) को बढ़ावा देना
भारत को अमेरिकी 'नागरिक धर्म' के समकक्ष 'संवैधानिक देशभक्ति' को अपनी मुख्य राष्ट्रीय पहचान बनाना होगा। इसका अर्थ यह है कि विभिन्न धर्मों, जातियों और भाषाओं के लोग जब आपस में जुड़ें, तो उनका साझा धागा भारत का संविधान हो। न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व (Preamble के आदर्श) हमारे राष्ट्रीय पूज्य मूल्य होने चाहिए।
• सभ्यतागत मूल्यों (सहिष्णुता और बहुलता) का पुनर्जागरण
भारत की पहचान केवल एक आधुनिक 'संविधान' से नहीं है, बल्कि उस 5000 वर्ष पुरानी सभ्यता से भी है जिसका मूल मंत्र 'वसुधैव कुटुंबकम्' (पूरी पृथ्वी एक परिवार है) और 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' (सत्य एक है, ज्ञानी उसे अलग-अलग पुकारते हैं) रहा है। यह सभ्यतागत हिंदुत्व या भारतीयता सर्व-समावेशी है, संकीर्ण नहीं। इसे राज्य की राजनीतिक पहचान बनाए बिना समाज के नैतिक आचरण का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
• अल्पसंख्यकों में विश्वास और समान अवसर
किसी भी मजबूत राष्ट्र की पहचान इस बात से होती है कि उसका सबसे कमजोर या अल्पसंख्यक नागरिक खुद को कितना सुरक्षित महसूस करता है। राज्य को बिना किसी तुष्टीकरण के, कानून के शासन (Rule of Law) को सख्ती से लागू करना चाहिए ताकि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को रोका जा सके। विकास की नीतियां वर्ग-निरपेक्ष और केवल आर्थिक आवश्यकता पर आधारित होनी चाहिए।
• नागरिक कर्तव्यों (Fundamental Duties) पर बल
राष्ट्र केवल अधिकारों की मांग से नहीं बनता। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51A में उल्लिखित मौलिक कर्तव्यों (जैसे- वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास, साझी संस्कृति की समृद्ध विरासत का सम्मान, और आपसी भाईचारे को बढ़ावा देना) को प्राथमिक शिक्षा से ही नागरिकों के जीवन का हिस्सा बनाना होगा।
अमेरिका और अरब जगत के उदाहरणों से स्पष्ट है कि पहचान की राजनीति यदि सीमा से बाहर चली जाए, तो वह राष्ट्रों को गृहयुद्ध या स्थायी सामाजिक विभाजन की ओर धकेल देती है। भारत के लिए भविष्य का रास्ता 'धर्मनिरपेक्षता बनाम हिंदुत्व' के शून्य-योग खेल (Zero-sum game) में नहीं है, बल्कि एक ऐसे संश्लेषण (Synthesis) में है जहाँ :
• धर्म प्रत्येक नागरिक का व्यक्तिगत और आध्यात्मिक विषय बना रहे।
• सभ्यता और संस्कृति हमारे आपसी जुड़ाव का सामाजिक सूत्र बनी रहे।
• संविधान हमारे शासन, न्याय और सार्वजनिक आचरण का सर्वोच्च मार्गदर्शक बना रहे।
सच्ची भारतीयता वही होगी जहाँ एक नागरिक अपनी धार्मिक पहचान पर गर्व करते हुए भी, अपनी प्राथमिक निष्ठा भारत के लोकतांत्रिक और पंथनिरपेक्ष संविधान के प्रति रखेगा। यही 'संवैधानिक राष्ट्रवाद' 21वीं सदी में भारत को विश्वगुरु और एक महाशक्ति बनाने का सबसे मजबूत आधार होगा।
Ambuj Singh Singh
www.studynovelty.com
Mukhyamantri Abhyuday Yojana Jhansi


Comments
Post a Comment