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भारत में जनांदोलन : जेपी से सीजेपी तक : एक आलोचनात्मक विमर्श Mass Movements in India : From JP to CJP : A Critical Discourse

  ​ भारत में जनांदोलन : जेपी से सीजेपी तक : एक आलोचनात्मक विमर्श  ​ लोकतंत्र की धड़कन और जनांदोलनों का बदलता स्वरूप ​लोकतंत्र केवल पांच वर्षों में एक बार मतदान करने की यांत्रिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह नागरिकों की सतत, सचेत और सक्रिय भागीदारी पर आधारित एक जीवंत व्यवस्था है। प्रसिद्ध दार्शनिक ज्यां-ज्याक रूसो ने कभी कहा था कि "ब्रिटेन की जनता केवल चुनाव के समय स्वतंत्र होती है, उसके बाद वह पुनः दास बन जाती है।" भारतीय लोकतंत्र इस दासता को नकारते हुए नागरिकों को 'जनांदोलनों' के रूप में एक ऐसा सशक्त माध्यम प्रदान करता है, जो सरकार को निरंतर जवाबदेह बनाए रखता है। स्वतंत्रता आंदोलन के गौरवशाली इतिहास से लेकर आधुनिक दौर के विभिन्न संघर्षों तक, जन आंदोलनों ने भारत की नीतियों, शासन व्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने को गहराई से प्रभावित किया है। ​परंतु, इक्कीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक में यह यक्ष प्रश्न भारतीय राजनीति के केंद्र में आ गया है कि क्या भारत में जनांदोलन अपनी वास्तविक परिवर्तनकारी क्षमता खो रहे हैं? जहाँ एक ओर हाल के कुछ आंदोलनों ने अभूतपूर्व जन-एकत्रीकरण दिखाया...