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अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस | International Yoga Day

 

STUDY NOVELTY

By: Ambuj Kumar Singh

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस | International Yoga Day

International Yoga Day

21/06/2021

योग : सम्पूर्ण जानकारी


हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी
सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही लाश का खुद मजार आदमी
जिंदगी का मुकद्दर सफर दर सफर
आखिरी सांस तक बेकरार आदमी

निदा फ़ाज़ली की यह ग़ज़ल आधुनिक युग के मानव की व्यथा की कहानी है । आधुनिक जीवन शैली ने इस कदर मानव जीवन को अव्यवस्थित कर दिया है कि मनुष्य पहले समाज और फिर परिवार से दूर हो चला है, और अंततः इस वह एकाकी जीवन में खुद से भी दूर हो जाता है । चूंकि उपभोक्तावादी आधुनिक व्यवस्था को बदलना तो संभव नहीं है, किंतु इस व्यवस्था में आई विद्रूपता के कारण पैदा होने वाली समस्याओं के निराकरण हेतु योग को एक साधन के रूप में अपनाया जा सकता है ।


योग की परिभाषा

योग संस्कृत के 'युज' शब्द से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है - एकीकृत करना, अर्थात जोड़ना । यह व्यक्तिगत चेतना का सार्वभौमिक चेतना अर्थात आत्मा के परमात्मा से मिलन का माध्यम है । पतंजलि ने लिखा है कि चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है । गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्मों में कुशलता का नाम ही योग है । इसी प्रकार बौद्ध धर्म में भी कुशल चित्त की एकाग्रता को योग कहा गया है । शरीर, मन और भावनाओं को संतुलित करके उनमें आपसी तालमेल बिठाने के साधन को योग कहा जा सकता है । वस्तुतः योग जीवन जीने का एक तरीका है, जिसके आध्यात्मिक उद्देश्य भी हैं ।


योग का इतिहास

योग का इतिहास उतना ही पुराना माना जा सकता है, जितना कि हमारी सभ्यता का । विश्व की सर्वाधिक पुरानी सभ्यताओं में शुमार सिंधु घाटी की सभ्यता में भी कुछ योग मुद्रा में कुछ आकृतियां मिली हैं जिन्हें 'आदियोगी शिव' का नाम दिया गया है । इसी आदियोगी शिव का उल्लेख हम वैदिक साहित्य में भी पाते हैं । छठी शताब्दी ईसा पूर्व में हम बौद्ध धर्म में तथा इसी के समानांतर उपनिषदों में भी हम 'योग' शब्द तथा उसकी वृहद व्याख्या पाते हैं, जिसे मुख्यतः मानसिक गतिविधियों पर नियंत्रण के संदर्भ में उल्लेखित किया गया है ।

पूर्व मध्यकाल में योग का इतिहास शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, यमुनाचार्य जैसे महान आध्यात्मिक संतो से जुड़ जाता है । मध्यकाल में हम मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ जैसे महान योगियों के अलावा सूफी संतों का नाम भी योग के साथ जुड़ा हुआ पाते हैं ।

आधुनिक युग में योगियों के रूप में स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद जैसे लोगों का नाम आता है । बाद में इस परंपरा को महेश योगी और आचार्य रजनीश ने काफी विस्तार दिया । वर्तमान में श्री श्री रविशंकर और बाबा रामदेव इसे वैश्विक पहचान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं ।


योग के प्रकार

'शिवसंहिता' एवं 'गोरक्षशतक' जैसे योग संबंधी ग्रंथों में योग के चार प्रकार बताए गए हैं -
1. मंत्रयोग - मन की चंचलता का मंत्र द्वारा निरोध ।
2. राजयोग - चित्तवृत्तियों का निषेध ।
3. हठयोग - पिंगला और इड़ा के सहारे प्राण को सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश कराकर ब्रह्मारंध्र में समाधिस्थ होने की क्रिया ।
4. लययोग - साधक के चित्त में हमेशा ब्रह्म का स्मरण ।

अन्य -
1. ज्ञानयोग - ज्ञान द्वारा ईश्वर के स्वरूप एवं वास्तविक स्थिति को समझना ।
2. कर्मयोग - कर्म के द्वारा ईश्वर की प्राप्ति ।
3. पूर्ण अद्वैत योग - यह महर्षि अरविंद द्वारा प्रतिपादित किया गया है । अष्टांग-योग को सरल एवं व्यापक बनाकर, तथा इसमें ज्ञान, कर्म एवं भक्तियोग को समाहित करने के कारण इसे व्यापक एवं श्रेष्ठ माना गया है ।


आधुनिक युग की चुनौतियां

पूंजीवाद एक सामान्य मानव के लिए शुरू से ही चुनौतियां पेश करता रहा है । प्रारंभ में कृषि पूंजीवाद उतनी चुनौतियां नहीं पेश करता था । किंतु व्यापारिक पूंजीवाद साम्राज्यवाद को जन्म देता है, और यहीं से चुनौतियां बढ़ जाती हैं । किंतु पूंजीवाद का सबसे बड़ा खतरा औद्योगिक पूंजीवाद के रूप में 'औद्योगिक क्रांति' के साथ शुरू होता है ।

औद्योगिक पूंजीवाद के बाद श्रमिक और पूंजीपति वर्ग की के बीच खाई बढ़ती जा रही है और इस असमानता ने वर्ग-संघर्ष की संभावनाओं को जन्म दिया है । एक तरफ जहां पूंजीपति वर्ग अपने लाभ को बढ़ाने के लिए श्रमिकों का शोषण करने के साधन के रूप में राजसत्ता का सहारा ले रहा है, वहीं  श्रमिक वर्ग संपूर्ण व्यवस्था के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए साम्यवाद को एक विकल्प के रूप में देख रहा है, और रूस और चीन में होने वाली क्रांतियां है इस बात की गवाह हैं ।

किंतु समस्या सिर्फ व्यवस्था का नहीं, व्यक्तित्व की भी है । एक तरफ जहां पूंजीपति वर्ग लाभ बढ़ाने के फेर में तनाव एवं अवसाद भरा जीवन जी रहे हैं, वहीं श्रमिक वर्ग अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संयुक्त परिवार को छोड़कर शहर में एकल परिवार की संकल्पना को जन्म देकर शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक विद्रूपता ओं का शिकार हो रहा है । इन्हीं के बीच मध्यवर्ग भी है, जो उपभोक्तावाद का शिकार है । वह इन दोनों के मध्य क्रांति एवं टकराव को रोकता है और आधुनिक मीडिया साधनों द्वारा प्रचारित भौतिक जीवन के सभी सुखों को पाने का प्रयास करता है । इस क्रम में यहां तीनों वर्गों के साथ परिवार, विवाह एवं नातेदारी से संबंधित समस्याएं दिखाई देती हैं ।

बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने  नवउपनिवेशवाद तथा वैश्वीकरण के मूलमंत्रों का सहारा लेकर पूरे विश्व में संचार माध्यमों से उपभोक्तावाद का खूब प्रचार किया है । आज टीवी और मोबाइल इसे और ज्यादा आगे बढ़ा रहे हैं । इसके अलावा पश्चिमी कार्य संस्कृति के प्रभाव में देर रात तक जागना, देर तक सोना, खानपान में अनियमिता, फास्ट फूड कल्चर तथा शारीरिक सक्रियता की कमी ने बहुत सारी सामाजिक, शारीरिक व मानसिक व्याधियों को जन्म दिया है ।


आधुनिक जीवन शैली का प्रभाव

आधुनिक जीवन शैली ने पूंजीपति, मध्यम वर्ग तथा श्रमिक वर्ग, तीनों को गहराई तक प्रभावित किया है । लालच, प्रतिस्पर्धा एवं काम के दबाव ने इन सभी वर्गों में तनाव को जन्म दिया है । तनाव ने व्यक्ति को अवसाद, ह्रदय रोग, शारीरिक क्षमताओं में कमी जैसे कई रोगों से जोड़ दिया है । इसके अलावा आधुनिक जीवन शैली से उत्पन्न मोटापा, तनाव, अवसाद, मधुमेह जैसे विभिन्न रोग मानव को असमय काल के गाल में पहुंचा रहे हैं । विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 10 से 24 वर्ष की उम्र के 23 लाख भारतीय आधुनिक शैली के कारण असमय मृत्यु का प्रतिवर्ष शिकार हो रहे हैं । नेशनल क्राइम ब्यूरो रिपोर्ट 2019 के अनुसार 1.39 लाख भारतीय प्रतिवर्ष तनाव एवं अवसाद की स्थिति में आत्महत्या कर रहे हैं । 2016 की मानसिक स्वास्थ्य रिपोर्ट के अनुसार 14% भारतीय मानसिक अस्वस्थता के शिकार हैं, जिनमें 2% लोगों की स्थिति बहुत ज्यादा गंभीर है । आज दुनिया में 15 करोड़ से ज्यादा बच्चे और किशोर मोटापा से ग्रस्त हैं । चीन के बाद विश्व में भारतीय बच्चे (2.75 करोड़) मोटापे की समस्या से ग्रसित हैं । भारत में 2025 तक लगभग 7 करोड़ मधुमेह रोगी होंगे ।


योग ही उपाय

वर्तमान में न हम उपभोक्तावादी समाज को बदल सकते हैं, और ना ही आधुनिक जीवन शैली को । इसके निवारण के लिए योग एक  विकल्प के रूप में दिखाई देता है । एक पुरानी कहावत है कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है । किंतु अगर मस्तिष्क स्वस्थ न हो, तो शरीर भी बहुत समय तक स्वस्थ नहीं रह सकता है । दोनों के स्वस्थता में ही समस्त  शारीरिक एवं मानसिक व्याधियों व्याधियों से मुक्ति का मार्ग दिखाई देता है ।

हाल के शोध बताते हैं कि तनाव एवं अवसाद के कारण छात्र पढ़ाई पर एवं कामकाजी वर्ग अपने काम पर पूरी तरीके से फोकस नहीं कर पाते हैं । योग इससे मुक्ति दिलाकर व्यक्ति का अपने कार्य पर फोकस बढ़ाता है, जिससे उसकी उत्पादकता में वृद्धि होती है ।

योग से मोटापा, रक्तचाप, मधुमेह, अस्थमा, गठिया, पाचन-विकार जैसी व्याधियों का इलाज संभव हुआ है । इसने नशा मुक्ति कार्यक्रम में भी सफल योगदान दिया है । योग से लोगों की जीवनशैली में सुधार हुआ है, जिससे उनकी रचनात्मकता में वृद्धि हुई है, तथा उनका आध्यात्मिक विकास भी संभव हुआ है । यहां तक कि कोविड के कारण दुष्चिन्ता, तनाव और अवसाद की अवस्था से बाहर निकलने में योग अत्यंत सहायक सिद्ध हुआ है ।


योग के नियम

योग एक व्यावहारिक विज्ञान है, और हर विज्ञान की तरह इसके भी कुछ नियम हैं, जो निम्नलिखित हैं -
- योगाभ्यास शुरू करने से पहले शारीरिक एवं मानसिक स्वस्थता एवं स्थिरता अत्यंत आवश्यक है ।
- योगाभ्यास सदैव योग्य गुरु के मार्गदर्शन में किया जाना चाहिए ।
- योगाभ्यास सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय करना चाहिए ।
- योगाभ्यास खुली जगह पर करना चाहिए, जहां ताजी हवा आ रही हो ।
- योग क्रिया खाली पेट करना चाहिए, तथा इसके तुरंत बाद भी कुछ नहीं खाना चाहिए ।
- योगाभ्यास स्नान के तत्काल बाद नहीं करना चाहिए तथा योगाभ्यास के तुरंत बाद भी स्नान नहीं करना चाहिए ।
- योगाभ्यास के दौरान शरीर से हठ नहीं करना चाहिए ।
- योगाभ्यास में निरंतरता अत्यंत आवश्यक है ।
- किसी बीमारी की दशा में योग क्रिया डॉक्टर की सलाह पर ही करनी चाहिए ।
- मासिक धर्म तथा गर्भावस्था की दशा में महिलाओं को डॉक्टर से परामर्श लेकर ही योग करना चाहिए ।
- व्यक्ति को रात्रि में 6 से 8 घंटे की नींद अवश्य लेना चाहिए ।
- तन एवं मन की स्वस्थता हेतु पौष्टिक आहार अत्यंत आवश्यक है ।
- योगाभ्यास करने वाले व्यक्ति को नशे से दूर रहना चाहिए ।


अष्टांग-योग

'योग-दर्शन (षड्दर्शन में एक) के पिता' महर्षि पतंजलि ने अपनी पुस्तक 'योगसूत्र' में अष्टांग-योग को इस प्रणाली का आधार माना है । यह 8 आयाम वाला मार्ग है, जिसका अभ्यास एक साथ किया जाता है । अष्टांग योग में निम्नलिखित तत्व शामिल हैं -
1. यम - सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य ।
2. नियम - तन और मन को स्वच्छ रखते हुए संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर के प्रति समर्पण ।
3. आसन - स्थिर एवं सुखपूर्वक बैठना ।
4. प्राणायाम - आसन के सिद्ध हो जाने पर श्वास-प्रश्वास की गति को नियंत्रित करना ।
5. प्रत्याहार - इंद्रियों को विषयों से हटाकर अंतर्मुखी करना ।
6. धारणा - मन को किसी भी विषय की ओर लगाना ।
7. ध्यान - किसी एक वस्तु या स्थान पर मन का स्थिर हो जाना ।
8. समाधि - चित्त की अवस्था जिसमें वह ध्येय के चिंतन में पूरी तरह से लीन हो जाता है ।

संसार के सभी व्यक्ति एवं राष्ट्र अंततः सुख एवं शांति चाहते हैं, और इसके लिए प्रयासरत भी हैं । किंतु अपनी अज्ञानता के कारण वे अपने पंथ एवं विचारों की स्थापना में ही शांति का मार्ग ढूंढने का असफल प्रयास करते हैं, जबकि पंथरहित अष्टांग-योग से ही वास्तविक शांति एवं आनंद की अनुभूति हो सकती है ।


योग के प्रति वैश्विक सहमति

योग क्रिया को भारत में प्राचीन काल से ही मान्यता मिली हुई है । किंतु वर्तमान में लोगों का इसके प्रति झुकाव ज्यादा दिखाई दिया है । किंतु भारत से कहीं चाहता यह विकसित देशों को आकर्षित कर रहा है, क्योंकि उपभोक्तावाद की चुनौतियों से सबसे ज्यादा वही ग्रसित हैं । इसीलिए जब 27 मई 2014 को भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा संयुक्त राष्ट्र में 'विश्व योग दिवस' का प्रस्ताव रखा गया, तो 193 देशों में 177 देशों ने इसे अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी । 21 जून 2015 को पहली बार योग दिवस मनाया गया । 21 जून 2021 को मनाए जाने वाले विश्व योग दिवस की थीम है - आरोग्य के लिए योग ।


21 जून को ही क्यों

21 जून को उत्तरी गोलार्ध में दिन सबसे लंबा होने के कारण इस दिन योग दिवस मनाया जाता है । इसके अलावा इसके आध्यात्मिक कारण के रूप में महायोगी शिव को भी बताया गया हैं, जिन्होंने ग्रीष्म संक्रांति के दिन ही अपने शिष्यों को शिक्षा दी थी । 21 जून को सबसे बड़े दिन के रूप में उसे ग्रीष्म संक्रांति माना जा सकता है । यह माना जाता है कि इसके बाद सूर्य दक्षिणायन होने लगता है, जो आध्यात्मिक शक्तियों के लिए लाभकारी होता है ।


उपसंहार 

मानव जीवन का लक्ष्य है, अपनी उच्चतम संभावनाओं को खोलना तथा समग्रता में जीकर सारे संसार के लिए निमित्त बनना । आज जब संपूर्ण विश्व कोविड-19 महामारी का सामना कर रहा है, तो ऐसे में हमारा यह उत्तरदायित्व बनता है कि मानव जीवन के इन्हीं लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु प्रयास करें और लोगों को प्रेरित भी करें । इसमें साधन की सुनिश्चितता एवं सुगमता हेतु सरकार माध्यम बन सकती है । अतः इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु सरकार एवं प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी बनती है कि वह स्वस्थ शरीर एवं मस्तिष्क के लिए योग को अपनाए और उसे बढ़ावा दे । इससे हम अपने वर्तमान एवं भविष्य के साथ ही अपना लोक-परलोक भी सुधार सकते हैं ।

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